'प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है'— इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए और बताइए कि कवि ने इसे मृगतृष्णा क्यों कहा है?
Answer
इसका भाव है कि धन, पद और बड़प्पन का अहसास एक छलावा है जो मनुष्य को असीम शांति नहीं देता; इसे मृगतृष्णा इसलिए कहा गया है क्योंकि इसके पीछे भागने से प्यास बुझने के बजाय और बढ़ती है।
Step-by-step solution
- 'प्रभुता का शरण-बिंब' का अर्थ है बड़प्पन, धन, पद या सत्ता के अहसास की छाया में सुख ढूँढना।
- 'मृगतृष्णा' वह भ्रम है जिसमें रेगिस्तान में हिरण को सूखी रेत पर जल का आभास होता है और वह जल पाने के लिए दौड़ता रहता है।
- कवि के अनुसार, संसार में सम्मान और प्रभुता की चाह भी एक छलावा है, क्योंकि मनुष्य जितना इसके पीछे भागता है, उसकी असंतुष्टि उतनी ही बढ़ती जाती है।
- हर सुखद स्थिति (चाँदनी रात) के पीछे कोई न कोई दुख (काली रात) छिपा होता है, इसलिए बड़प्पन का मोह केवल एक भ्रम है।
Common mistake: मृगतृष्णा का केवल शाब्दिक अर्थ (हिरण की प्यास) लिख देना और प्रभुता के साथ उसका दार्शनिक संबंध न जोड़ना।
Concept tested: प्रभुता का शरण-बिंब और भ्रम
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